काफ़ी दिनों से सोनी टीवी पर लव मैरिज या अरैंज मैरिज का प्रोमो देख रहा हूं। दो दोस्तों के दो अलग-अलग विचार, एक पूरब तो दूसरी पश्चिम। लगता है जैसे हमारे आस-पास की दुनिया हो। हम भी तो शादी की बात आते ही आपस में बात करने लगते हैं कि कौन सी शादी सही है, लव या अरैंज? वैसे तो मैं ख़ुद शादी में विश्वास नहीं रखता लेकिन कई बार लव-अरैंज की बहस का हिस्सा रहा।
मेरी एक सहकर्मी ने कहा “मैं आज भी अपने पति को प्यार करती हूं और उनके लिए कुछ भी कर सकती हूं लेकिन बिना सहयोग और आपसी समझ के एकतरफा रिश्ता नहीं चल सकता, अब वो अरैंज मैरिज हो या लव मैरिज।”
ज़ाहिर है शादी से पहले लव हो या शादी के बाद लव हो बिना लव के शादी या फिर कहें कोई भी रिश्ता आगे नहीं चल सकता फिर भी ऐसा क्या है जो अक्सर हर रिश्ते में ये लेकिन शब्द आ जाता है। ज़रुर कुछ है जो शादी की डोर बांधे रखने के लिए लव से भी कहीं ज़्यादा ज़रूरी है जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, चाहे वो लव मैरिज हो या अरैंज मैरिज।
हम भले हो न हों, हमारा क़ानून, हमारा समाज महिलाओं के हितों को लेकर काफ़ी फ़िक्रमंद रहता है और उसका असर ये है कि आज की तारीख़ में अरैंज मैरिज के हालात वैसे नहीं रहे जैसे पहले हुआ करते थे। शिक्षा ने भी इसे काफ़ी हद तक बदल दिया है। अब ऐसा नहीं है कि अरैंज मैरिज में महिलाएं स्वाभिमान के लिए संघर्ष करती है जो लव मैरिज में अपने आप मिल जाया करता है। आज के न्यूक्लियर फेमिली के कॉन्सेप्ट में शादी को बनाए रखना एक मजबूरी है और ये महिला और पुरुष दोनों को एक-दूसरे की इज़्ज़त करने के लिए प्रेरित करता है।
अब सवाल है कि वो क्या है जो शादी के रिश्ते में लव से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है, वो क्या है जो दोनों पार्टनर्स को मजबूर करता है एक दूसरे के साथ चलने और एक-दूसरे को जीवन में बराबर की जगह देने के लिए। ये है समझौता, समझौता किसी भी रिश्ते की चाबी है। शादी के मामले में कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है क्योंकि दो अलग-अलग माहौल में पले-बढ़े इंसान एक छत के नीचे आ जाते हैं, एक ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे में एक-दूसरे की पसंद, नापसंद से तालमेल बिठाना लव से भी ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है।
अरैंज मैरिज के मामले में ये समझौता अक्सर एक तरफा होता है। महिलाएं अक्सर अपनी खुशियों, अपनी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं से समझौता कर लेती हैं। वहीं लव मैरिज में ये दोनों तरफ से ज़रूरी हो जाता है। वहां अगर समझौते की सीढ़ी बराबर नहीं है तो रिश्ते में बैलेंस नहीं रह पाता। ये उसी तरह से है जैसे दो वस्तुओं की आपस में टक्कर कराई जाए, अगर दोनों कठोर हुए तो दोनों का टूटना तय है और अगर दोनों में कोई एक नरम है तो एक दब जाता है और नुकसान के चांसेज़ कम होते हैं। लेकिन सच ये भी है कि अगर दोनों नरम हैं तो दोनों दबते हैं और किसी को कोई नुकसान नहीं होता।
हर रिश्ते के लिए एक फेज़ होता है “Getting to Know You” और इस “Getting to Know You” फेज़ में जो पास हो गया वो पास हो गया, जो फेल हो गया वो फेल हो गया। अरैंज मैरिज में ये फेज़ शादी के बाद आता है और लव मैरिज में ये फेज़ शादी से पहले आता है। हालांकि अब शहरों में अरैंज मैरिज के लिए “Getting to Know You” फेज़ पहले प्लांट किया जाने लगा है लेकिन फिर भी ये नाकाफी साबित हो रहा है।
ऐसे में अरैंज मैरिज समझौते की शर्त पर तब फेल हो जाती है जब वन साइडेड डॉमिनेंसी होती है, और यहां मेल डॉमिनेंसी के चांसेज़ ज़्यादा होते हैं क्योंकि हिंदुस्तान में शादीकर लड़की को अपने ससुराल जाना होता है जहां उसके लिए सिर्फ पति ही अजनबी नहीं होता, उसकी पूरी दुनिया ही अजनबी हो जाती है। वो किसी कॉलेज में ऐसे स्टुडेंट की तरह होती है जहां सारे के सारे उसके सीनियर होते हैं और वो अकेली जूनियर, जिसकी रैगिंग लेने के लिए सब तैयार होते हैं।
वहीं लव मैरिज में वन साइडेडे डॉमिनेंसी होने के चांसेज़ बनिस्पत कम होते हैं। यहां भी लड़की ससुराल ही जाती है लेकिन ये दुनिया उसके लिए अजनबी नहीं होती। ये कॉलेज ऐसा होता है जहां उसका आना-जाना पहले से लगा होता है।
अब सवाल ये है कि जब लव मैरिज में इतनी अच्छाइयां हैं तो इसके टूटने के चांसेज़ ज़्यादा क्यों होते हैं। इसके लिए मैं अपने भूत में कई साल पीछे जाता हूं साल 1999-2000 में जब मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे और पिछड़े ज़िले देवरिया कोर्ट में काम किया करता था। वहां काम करते हुए मैंने देखा कि सबसे ज़्यादा मुकदमे अगर किसी मामले के हैं तो वो हैं तलाक के बाद खर्च मांगने के यानी कह सकते हैं कि तलाक के। और ये मुकदमे ऐसे इलाके के हैं जहां लव मैरिज का प्रचलन न के बराबर है। ज़ाहिर है लव मैरिज के ज़्यादा कमज़ोर होने और ज़्यादा टूटने की जो भी विचारधारा है वो कुछ नहीं है महज़ छलावा है। और ऐसा इसलिए क्योंकि समाज में लोगों की लव मैरिज टूटने पर ज़्यादा नज़र रहती है बनिस्पत अरैंज मैरिज के। टूटते तो दोनों रिश्ते हैं और बराबरी में टूटते हैं।
मेरी ये एनालिसिस तो यही कहती है कि लव मैरिज ज़्यादा सही है। लेकिन ये बहस अभी ख़त्म नहीं हुई है...




Nice attempt to clarify.......& nice dicision, marriage hamesha achhi hoti hai kyonki yah hamen family deti hai, pyar detI hai, company deti hai.
ReplyDeleteOne more thing kahin bhi hum ho har jagah hame adjust karna padta hai.jab hum ek doosre.ki. respect karne lage sab asana ho jata haI
Nice attempt to clarify.......& nice dicision, marriage hamesha achhi hoti hai kyonki yah hamen family deti hai, pyar detI hai, company deti hai.
ReplyDeleteOne more thing kahin bhi hum ho har jagah hame adjust karna padta hai.jab hum ek doosre.ki. respect karne lage sab asana ho jata haI
सत्या वच बहना
DeleteNicely written article.This debate is never ending. Love and to keep love alive marry someone else :)
ReplyDeletePrashant:
http://coffeefumes.blogspot.in/2012/08/love-arranged-marriage.html
Thanks buddy giving your time at this article
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